Wednesday, December 4, 2019

Happy family *****

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·         सुखी परिबार किस्से कह्तेहे ?

Madhusudan Majhi

घर उसे कह्तेहें जाहाँ भीड़ चाल , जाहाँ  आनदं का साम्राज्य हे ,जाहाँ बाचों का मधुर आबाज हे ,जहाँ पे खुसी हे हसी हे , उसे ही घर ,और परिबार केहेते हे .....


दुनियां में इन्सान का पेहला आब्स्यकता हे .खाना ,बस्तर ,मकान .! इन्सान आबास कु घर कहते आये हें लेकिन घर और आबास में एक प्रभेद हे ,सब घर आबस होसाकता हे ,लेकिन सब आबस कु हम घर नहीं केह सकते हें क्यूँ की ?  घर उसे कह्तेहें जाहाँ भीड़ चाल , जाहाँ  आनदं का साम्राज्य हे ,जाहाँ बाचों का मधुर आबाज हे ,जहाँ पे खुसी हे , हसी हे , उसे ही घर ,और परिबार केहेते हे .....
             ( रामूएल स्माइल कहते हें ....इन्सान हें घर का निर्माता )
हाल मेंच कहते हें ....”””संदार्ज्य एक अलौकिक दान हे “”” लेकिन सुन्दर कपडे, आबास, सुन्दर चीज .ये  सब परिबार का सुन्दर के आगे फीकी हे ...
जेरेनी टेलर कहते हें ..”एकला जिन्दगी से विबाहित जिन्दगी बेहतर सुरखित हे ”
विबाहित जिन्दगी में आनंद जादा बिपत कम हे .अगर परिबार में अनक कास्ट हे ता सुख बी अनेक हे |
परिबार का बझ बढेगा तो उस कु उठा ने केलिये बहत लोग का मदत मिलता हे .और वो काम  करने केलिए आसन हो जाए गा ...क्यूँ की पृथ्वी का जननी का नाम हे परिबार ... इस की वाजेसे साम्राज्य सुरखित रहता हे , सीरप सेहर ,मंदिर  ही नहीं स्वर्ग में भी परिबार का बस्ती हो सकता हे ???

               **** परिबार ****


जो इनसान घर सनसार मुक्ति पाने केलिए सादी नहीं कर्र्ता हे  ,सांसारिक परिबारिक जेसे प्यार  उस कु नहीं मिलपाता  हे | दुनियां में बहत लोग हे जो सादी  नहीं की हे  | उसका जिन्दगी सफल काहाजाता हे, लेकिन जो ब्यक्ति उनका करीब से सीरप वो ही जनता हे की कितना वो लोग सफल हे .  दुनियां में ऐसे महिला नहीं हे  जिसका ऊपर अभिनय का प्रभाब पड़ा हे .उन का इच्छा हे की उनकू अगर बिस्वा का बिख्यात अभिनेत्री बछा जायेगा .तो खुद कु सुँर्ग का अप्सरा मन ने लगेंगे . इसी खुब्स्रुती का बारे में एक अभिनेत्री ने कहा ....में ये रे ईएसआई लकड़ी कु देना चाहती हूँ की वो लड़की घर में पुराने कपने पहने या कुछ भी करे ,लेकिन स्टेज में नहीं आना चाइये .क्यूँ की अक रंग मंच का अभिनेत्री किसी एक का भी नहीं होता हे ,क्यूँ की उसका धयान एक के पास नहीं रहता  , हर पुरुस का इच्छा हे की उसका पत्नी का पाओं से लेकर सर तक का खुब्स्रुती उसीका हो .और उसका नाम बिग्यांपन में ना आए.

*****नारी*****

नारी का सम्मान सदा होना चाहिए। नारी सौर्ग से बनाया हुइ सब से खूब सूरत उपहार हे  संस्कृत में एक श्लोक है- 'यस्य पूज्यंते नार्यस्तु तत्र रमन्ते देवता: ( जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं।) किंतु आज हम देखते हैं कि नारी का हर जगह अपमान होता चला जा रहा है। उसे 'भोग की वस्तु' समझकर आदमी 'अपने तरीके' से 'इस्तेमाल' कर रहा है। नारी एकला कहीं चल नहीं पारा हे .. यह बेहद चिंताजनक बात है।

           आइए देखते हैं हम नारी का कैसे सम्मान करें।
नारी का सबसे पवित्र रूप मां के रूप में देखने में आता है। माता यानी जननी। मां को ईश्वर से भी बढ़कर माना गया है, क्योंकि ईश्वर की जन्मदात्री भी नारी ही रही है। मां देवकी (कृष्ण) तथा मां पार्वती (गणपति/ कार्तिकेय) के संदर्भ में हम देख सकते हैं इसे।

लेकिन  बदलते समय के हिसाब से संतानों ने अपनी मां को महत्व देना कम कर दिया है। यह चिंताजनक पहलू है। सब धन-लिप्सा व अपने स्वार्थ में डूबते जा रहे हैं। (सिर्फ) मेरी बीवी व मेरे बच्चे यही आजकल परिवार की परिभाषा रह गई है। फिर बुजुर्ग माता-पिता की सेवा कौन करे? यह सवाल आजकल यक्षप्रश्न की तरह चहुंओर पांव पसारता जा रहा है। नई पीढ़ी को आत्मावलोकन करना चाहिए।


 बाजी मार रही हैं लड़कियां


अगर आजकल की लड़कियों पर नजर डालें तो हम पाते हैं कि ये लड़कियां आजकल बहुत बाजी मार रही हैं। इन्हें हर क्षेत्र में हम आगे बढ़ते हुए देखते हैं। विभिन्न परीक्षाओं की मेरिट लिस्ट में लड़कियां तेजी से आगे बढ़ रही हैं। किसी समय इन्हें कमजोर समझा जाता था, किंतु इन्होंने अपनी मेहनत और मेधा शक्ति के बल पर हर क्षेत्र में प्रवीणता अर्जित कर ली है। इनकी इस प्रतिभा का सम्मान किया जाना चाहिए | नारी का सारा जीवन पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने में ही बीत जाता है। पहले पिता की छत्रछाया में उसका बचपन बीतता है। पिता के घर में भी उसे घर का कामकाज करना होता है तथा साथ ही अपनी पढ़ाई भी जारी रखनी होती है। उसका यह क्रम विवाह तक जारी रहता है।

उसे इस दौरान घर के कामकाज के साथ पढ़ाई-लिखाई की दोहरी जिम्मेदारी निभानी होती है, जबकि इस दौरान लड़कों को पढ़ाई-लिखाई के अलावा और कोई काम नहीं रहता है। कुछ नवुयवक तो ठीक से पढ़ाई भी नहीं करते हैं, जबकि उन्हें इसके अलावा और कोई काम ही नहीं रहता है।
विवाह पश्चात तो महिलाओं पर और भी भारी जिम्मेदारी आ जाती है। पति, सास-ससुर, देवर-ननद की सेवा के पश्चात उनके पास अपने लिए समय ही नहीं बचता है। वे कोल्हू के बैल की मानिंद घर-परिवार में ही खटती रहती हैं। संतान के जन्म के बाद तो उनकी जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। घर-परिवार, चौके-चूल्हे में खटने में ही एक आम महिला का जीवन कब बीत जाता है, पता ही नहीं चलता।

कई बार वे अपने अरमानों का भी गला घोंट देती हैं घर-परिवार की खातिर। उन्हें इतना समय भी नहीं मिल पाता है वे अपने लिए भी जिएं। परिवार की खातिर अपना जीवन होम करने में भारतीय महिलाएं सबसे आगे हैं।

बच्चों में संस्कार भरन


बच्चों में संस्कार भरने का काम मां (नारी) दुवारा ही किया जाता है।अगर अरत या नारी अगर बच्चे कु संस्कार नहीं सिखायंगे तो बच्चे अच्छा संस्कारी नहीं हो पाएंगे  यह तो हम सभी बचपन से सुनते चले आ रहे हैं कि बच्चों की प्रथम गुरु मां ही होती है। मां के व्यक्तित्व-कृतित्व का बच्चों पर सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रकार का असर पड़ता है।

इतिहास उठाकर देखें तो मां पुतलीबाई ने गांधीजी व जीजाबाई ने शिवाजी महाराज में श्रेष्ठ संस्कारों का बीजारोपण किया था। जिसका ही परिणाम है कि शिवाजी महाराज व गांधीजी को हम आज भी उनके किये हुए आछी कर्म के वाजेसे व लोग आज भी अमर हे |और अमर ही रहेंगे

अभद्रता की पराकाष्ठ

आजकल महिलाओं के साथ अभद्रता की पराकाष्ठा हो रही है। रेप किया जाता हे बलात्कार किया गया हे ये बात हम रोज न्यूज़ पेपर में सुनेकू मिलता हे . शायद ही कोई दिन जाता हो, जब महिलाओं के साथ की गई अभद्रता पर समाचार न हो।
इसका प्रमुख कारण यह है कि सोसियल मिडिया में दिन पे दिन अश्लीलता बढती जरिही हे | इसका नवयुवकों के मन-मस्तिष्क पर बहुत ही खराब असर पड़ता है। वे इसके क्रियान्वयन पर विचार करने लगते हैं। परिणाम होता है दिल्ली गैंगरेप जैसा जघन्य व घृणित अपराध।


अशालीन वस्त्र भी एक कारण


कतिपय 'आधुनिक' महिलाओं का पहनावा भी शालीन नहीं हुआ करता है। इन वस्त्रों के कारण भी यौन-अपराध बढ़ते जा रहे हैं। इन महिलाओं का सोचना कुछ अलग ढंग का हुआ करता हैं। वे सोचती हैं कि हम आधुनिक हैं। हम चाहें जैसे रहें, हमें कौन रोकने-टोकने वाला है? यह विचार उचित नहीं कहा जा सकता है। अपराध होने यह बात उभरकर सामने नहीं आ पाती है कि उनके वस्त्रों के कारण भी यह अपराध हुआ है।

इतिहास स  


देवी अहिल्याबाई होलकर, मदर टेरेसा, इला भट्ट, महादेवी वर्मा, राजकुमारी अमृत कौर, अरुणा आसफ अली, सुचेता कृपलानी और कस्तूरबा गाँधी आदि जैसी कुछ प्रसिद्ध महिलाओं ने अपने मन-वचन व कर्म से सारे जग-संसार में अपना नाम रोशन किया है। कस्तूरबा गांधी ने महात्मा गांधी का बायां हाथ बनकर उनके कंधे से कंधा मिलाकर देश को आजाद करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

इंदिरा गांधी ने अपने दृढ़-संकल्प के बल पर भारत व विश्व राजनीति को प्रभावित किया है। उन्हें लौह-महिला यूं ही नहीं कहा जाता है। इंदिरा गांधी ने पिता, पति व एक पुत्र के निधन के बावजूद हौसला नहीं खोया। दृढ़ चट्टान की तरह वे अपने कर्मक्षेत्र में कार्यरत रहीं। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति रोनाल्ड रेगन तो उन्हें 'चतुर महिला' तक कहते थे, क्योंकि इंदिराजी राजनीति के साथ वाक्-चातुर्य में भी माहिर थीं।

अंत में...


अंत में हम यही कहना ठीक रहेगा कि हाम  हर महिला का सम्मान करें, क्योंकि दुनिया की आधी आबादी के बलबूते पर ही आदमी यहां तक आया है। उसे ठुकराना नहीं चाहिए।

जिस सीढ़ी (महिला) के बलबूते पर आदमी यहां तक आया, उसका तिरस्कार, अपमान कतई उचित नहीं कहा जा सकता है। भारतीय संस्कृति में महिलाओं को देवी, दुर्गा व लक्ष्मी आदि का यथोचित सम्मान दिया गया है अत: उसे उचित सम्मान दिया जाना चाहिए।

(समाप्त………..धन्यवाद )




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